रायपुर. वीआईपी रोड श्री राम मंदिर परिसर में आयोजित श्रीमद भागवत प्रवचन के दूसरे दिन की कथा का शुभारंभ आचार्य हिमांशु कृष्ण भारद्वाज महाराज ने समय के सदुपयोग और दुरुपयोग प्रसंग के वर्णन से किया।
उन्होंने कहा कि इस जगत में भगवान ने सभी को समय समान रूप से दिया है। श्रीमद् भागवत की कथाएं समय का संपादन और मैनेजमेंट की कला सिखाती है। जिससे जीवन वैभव और समृद्धि का विकास होता है। इस जगत में भगवान से सभी के समय एक समान ही दिया है। हम उसके उपयोग और दुरुपयोग से किसी स्थिति को प्राप्त करते हैं। भागवत में समय के सदुपयोग के लिए भक्ति के सर्वश्रेष्ठ मार्ग बताया गया है। श्रीमद् भागवत को भगवान का ज्ञानमय विग्रह मनाया गया है। सदकर्म की उपासना ही धर्म का पालन है। उन्होंने सत्संग की महिमा का वर्णन करते हुए कहा कि जीवन में सदगुणों का विकास साधुओं के संगत से होती है और व्यक्ति के जीवन में उत्तम गुणों का विकास होता है।
आचार्यश्री ने आत्मदेव की कथा की चर्चा करते हुए कहा कि पुत्र की कामना से व्याकुल आत्मदेव के दो पुत्र हुए, उसमें गौकर्ण सदाचारी और धुंधुकारी दुाराचारी था। अंतत: दुराचारी धुंधकारी मृत्यु के बाद प्रेत योगी को प्राप्त होता है। जिसकी मुक्ति के लिए गौकर्ण द्वारा श्रीमद भगवात कथा का आयोजन किया गया जिसे सुनकर धुंधकारी जैसे दुराचारी को मोक्ष की प्राप्ति हुई।
महाराजश्री ने कहा कि भागवत की कथा श्रवण करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। और व्यक्ति भागवत की कथा पितरों के मोक्ष और सदगति के लिए मुख्य रूप से कराते हैं। पितर मानव जीवन के प्रथम देवता हैं। उनकी तृप्ति और संतुष्टि से जीवन और घर परिवार में सुखा और समृद्धि आती है। इसलिए सदैव पितरों की संतुष्टि के लिए भागवत और पूजा-पाठ का अनुष्ठान करना चाहिए।
कथा आयोजन समिति के राजेन्द्र जी और कैलाश मोरारका ने जानकारी दी कि अपरान्ह 4 बजे से कथा होती है। आज के आयोजन में राजेन्द्रजी के अलावा सुनील अग्रवाल, कैलाश मोरारका, पुरुषोत्तम सिंघानिया, कैलाश अग्रवाल, विनोद अग्रवाल, संजय अग्रवाल परिवार सहित शामिल हुए। इसी तरह राम अवतार भोग परिवार, रवीन्द्रजी, भारवी, पार्षद अनामिकाजी, ललित सिंघानिया, सुरजीत छाबड़ा,विनोद अग्रवाल, शैलेष अग्रवाल, वीरेंद्र गोयल, पवन अग्रवाल (पाइप इस्पात), हर्षित सिंघानिया, हनुमंतजी, बृजलाल गोयल और गोविंद अग्रवाल, विक्रम केवलानी, पुष्पेंद्र उपाध्याय, पवन अग्रवाल, राजेश तांडी, और जमना दास बजाज, डा अनिल द्विवेदी का विशेष योगदान रहा।
माताएं थिरकने लगीं
महाराज श्री भारद्वाज की आजोस्वी और सरसवाणी में संगीतमय कथा सुनकर महिलाएं और पुरुष भावविभोर होकर थिरकने लगी। भगवान कृष्णा की चर्चा करते हुए उन्होंने भगवान की महिला का वर्णन करते हुए कहा कि जो मनुष्य भगवान की कथा और दरबार नृत्य करने लगे तो समझ लेना की संसार के झंझटों से मुक्ति मिलने का अवसर जीवन में आ गया है। जब तक आदमी संसार में नाचता है तब जीवन में सुख और शांति का अनुभव नहीं आता है। जब वही श्रद्धालु भगवान के लिए नृत्य करता है तो उसके जीवन भक्ति का उदय हो रहा है।
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