नई दिल्ली, 24 मार्च. 13 वर्षों तक जीवन और मृत्यु के बीच जूझते हुए गाजियाबाद के हरीश राणा ने आखिरकार मंगलवार को इस दुनिया को अलविदा कह दिया। उनकी विदाई ने हर आंख को नम कर दिया, लेकिन साथ ही एक सुकून भी छोड़ा—एक लंबे संघर्ष का अंत हो चुका था।
करीब 13 साल तक कोमा की स्थिति में रहने के बाद हरीश राणा ने अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में अंतिम सांस ली। उनका जीवन साहस, धैर्य और जिजीविषा की एक अनोखी मिसाल बन गया।
अंतिम विदाई का भावुक क्षण
करीब एक सप्ताह पहले, जब उन्हें अस्पताल ले जाया जा रहा था, उन्होंने हाथ जोड़कर जैसे अंतिम विदाई दी। यह पल बेहद मार्मिक था—इससे यह साफ झलक रहा था कि वे अपनी स्थिति को महसूस कर रहे थे। उनके इस मौन प्रणाम ने हर किसी को भीतर तक झकझोर दिया।
हादसा जिसने सब कुछ बदल दिया
हरीश राणा की कहानी जुलाई 2010 में चंडीगढ़ से शुरू हुई, जब उन्होंने सिविल इंजीनियरिंग में दाखिला लिया। लेकिन अगस्त 2013, रक्षाबंधन के दिन, एक हादसे ने उनकी जिंदगी बदल दी। बहन से फोन पर बात करते हुए वे पीजी की चौथी मंजिल से गिर गए।
गंभीर हालत में पहले पीजीआई चंडीगढ़ और फिर दिल्ली के एलएनजेपी अस्पताल में उनका इलाज हुआ। डॉक्टरों ने उन्हें क्वाड्रिप्लेजिया से ग्रसित बताया—एक ऐसी स्थिति जिसमें पूरा शरीर निष्क्रिय हो जाता है। इसके बाद से वे 13 वर्षों तक बिस्तर पर ही रहे।
इच्छामृत्यु की कानूनी लड़ाई
हरीश राणा का मामला कानूनी रूप से भी बेहद संवेदनशील रहा। सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च 2026 को उन्हें पैसिव यूथेनेशिया (इच्छामृत्यु) की अनुमति दी। इससे पहले दिल्ली हाईकोर्ट ने 8 जुलाई 2025 को परिवार की याचिका खारिज कर दी थी।
सुप्रीम कोर्ट की अनुमति के बाद, डॉक्टरों की निगरानी में एक सप्ताह तक उनका भोजन और पानी रोका गया और लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटा लिए गए। पिछले छह दिनों से वे बिना भोजन-पानी के थे और अंततः उन्होंने शांतिपूर्वक अंतिम सांस ली।
अस्पताल के अंतिम दिन
हरीश राणा एम्स के उपशामक देखभाल वार्ड में भर्ती थे, जहां डॉक्टरों की विशेष टीम उनकी निगरानी कर रही थी।
उनकी मां अस्पताल के गलियारे में बैठकर हनुमान चालीसा का पाठ कर रही थीं। एक ओर वे चमत्कार की उम्मीद लगाए थीं, तो दूसरी ओर बेटे के शांतिपूर्ण विदा के लिए प्रार्थना भी कर रही थीं। यह दृश्य हर किसी को भावुक कर देने वाला था।
मृत्यु के बाद भी जीवन का संदेश
अपनी अंतिम यात्रा से पहले हरीश राणा ने अंगदान का निर्णय लेकर मानवता की सर्वोच्च मिसाल पेश की।
आज भले ही वे हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनका दिल किसी और के भीतर धड़क सकता है, उनकी आंखें किसी और की दुनिया रोशन कर सकती हैं।
एक प्रेरणादायक विरासत
हरीश राणा की कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि एक परिवार के संघर्ष, उम्मीद और साहस की कहानी है।
13 साल का दर्द, अदालतों की लंबी लड़ाई और अंत में लिया गया निर्णय—यह सब मिलकर एक ऐसी विरासत बनाते हैं, जो आने वाले समय में मानवता को प्रेरित करती रहेगी।
उनकी विदाई सिर्फ एक अंत नहीं, बल्कि कई नए जीवनों की शुरुआत है।

