श्रद्धांजलि : विनोद कुमार शुक्ल: साहित्य जगत और समाज की बड़ी क्षति है उनका चला जाना

  • गिरीश पंकज, वरिष्ठ साहित्यकार

हिंदी साहित्य के सबसे महत्वपूर्ण, चर्चित साहित्यकार ज्ञानपीठ सम्मान से विभूषित विनोदकुमार शुक्ल जी अब हमारे बीच नहीं रहे। आगामी 1 जनवरी 2026 को वे 90 साल के हो जाते लेकिन शारीरिक अस्वस्थता के कारण वे हम सबको 23 दिसंबर, 2025 की शाम छोड़कर बहुत दूर चले गए. छत्तीसगढ़ का होने के कारण हम सबके लिए गर्व की बात यह रही कि वह राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय फलक पर नक्षत्र की तरह चमकते रहे। उनको मिलने वाली सम्मान राशि लगभग एक करोड़ से अधिक हो चुकी है। लेकिन महत्व राशि का नहीं है, उनकी कृतियों के सम्मान का है, जिनके कारण वे निरंतर चर्चित रहे। अंततः 2024 का देश का सबसे बड़ा साहित्यिक सम्मान ज्ञानपीठ उन्हें गत नवम्बर माह में रायपुर आ कर समर्पित किया गया। विनोद कुमार शुक्ला मेरे आदर्श इसलिए रहे कि उन्होंने किसी भी सम्मान के लिए कहीं कोई आवेदन नहीं दिया। सारे सम्मान उन्हें अपने आप प्राप्त हुए। उन्होंने हिंदी साहित्य में अपनी एक विशेष जगह इसलिए बनाई क्योंकि उन्होंने भाषाई प्रयोग बहुत किया।उनकी कहानी कभी सपाट कहानी नहीं रही। उनके उपन्यास परम्परा से हट कर थे। उनकी कहानी में कहानी कम कला-कौशल ज्यादा नजर आया करता था।यही कारण है कि उन्हें एक विशिष्ट प्रयोगधर्मी रचनाकार के रूप में देश-दुनिया में प्रतिष्ठा मिली। उनकी पुस्तकों के शीर्षक पाठकों को चौंकाते रहे। उनका पहला काव्य संग्रह आया था 1971 में जिसका नाम था ‘लगभग जयहिंद”। फिर 1981 में बेहद लंबे शीर्षक वाला एक संग्रह आया ‘वह आदमी चला गया नया गरम कोट पहिनकर विचार की तरह’।सब कुछ होना बचा रहेगा ‘ वर्ष 1992, अतिरिक्त नहीं ‘ वर्ष 2000, कविता से लंबी कविता ‘ वर्ष 2001,आकाश धरती को खटखटाता है ‘ वर्ष 2006.,पचास कविताएँ’ वर्ष 2011,कभी के बाद अभी ‘ वर्ष 2012., कवि ने कहा- ‘चुनी हुई कविताएँ वर्ष 2012, प्रतिनिधि कविताएँ ‘ वर्ष 2013.
हिंदी साहित्य को उन्होंने कुछ चर्चित उपन्यास भी दिए। नौकर की कमीज़ ‘ वर्ष 1979, खिलेगा तो देखेंगे ‘ वर्ष 1996.,दीवार में एक खिड़की रहती थी ‘ वर्ष 1997, हरी घास की छप्पर वाली झोपड़ी और बौना पहाड़ ‘ वर्ष 2011, यासि रासा त ‘ वर्ष 2016
और एक चुप्पी जगह’ वर्ष 2018। नौकर की कमीज पर तो मणि कौल ने फिल्म भी बनाई थी। यह अलग बात है कि फिल्म उतनी लोकप्रिय नहीं हो पाई।
उनके कुछ चर्चित कहानी संग्रहो के नाम हैं,पेड़ पर कमरा ‘ वर्ष 1988.,महाविद्यालय ‘ वर्ष 1996,क कहानी ‘ वर्ष 2021, घोड़ा और अन्य कहानियाँ ‘ वर्ष 2021.
विनोद कुमार शुक्ल अपनी जादुई यथार्थ वाली भाषा के कारण हिंदी साहित्य में अपनी एक विशिष्ट पहचान बना सके।कहानी और उपन्यास के पारंपरिक विधान को उन्होंने तोड़ा और शिल्प को थोड़ा-सा जटिल किया। यह जटिलता साहित्य की प्रयोगधर्मिता की रही,जिसे बुद्धिवादी पाठको ने तो खूब स्वीकार किया लेकिन जो सामान्य पाठक थे, उनके बीच विनोदकुमार शुक्ला का लेखन स्वीकार्य नहीं हो पाया। उनकी कविताओं का शिल्प भी बेहद जटिल किस्म का था। वह खुद कहते भी थे कि मेरी कविताएं आम पाठकों के लिए नहीं हैं। वह ज्यादातर बौद्धिक विमर्श की कविताएँ हैं। कुछ कविताएं बेहद सहज, सरल हैं इसलिए लोकप्रिय हुई।यही कारण रहा कि जब वे अक्सर किसी समारोह में जाते और लोगों का बहुत आग्रह होता तो वह अपनी चर्चित कविताओं का ही पाठ किया करते थे। उन कविताओं में एक कविता यहां प्रस्तुत कर रहा हूँ :-

“हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था
व्यक्ति को मैं नहीं जानता था
हताशा को जानता था
इसलिए मैं उस व्यक्ति के पास गया
मैंने हाथ बढ़ाया
मेरा हाथ पकड़कर वह खड़ा हुआ
मुझे वह नहीं जानता था
मेरे हाथ बढ़ाने को जानता था
हम दोनों साथ चले
दोनों एक दूसरे को नहीं जानते थे
साथ चलने को जानते थे।”

मुझे लगता है विनोद कुमार शुक्ल के जाने के बाद साहित्य की दुनिया में एक जो सन्नाटा पसरेगा, उसकी भरपाई लंबे समय तक नहीं हो पाएगी,क्योंकि जिस स्टाइल में विनोद कुमार जी अपना लेखन कर रहे थे उस स्टाइल या शैली हिंदी में अन्यत्र दुर्लभ रही। इसलिए भीड़ में भी वह अकेले रचनाकार के रूप में दिखाई देते थे। वे अच्छे रचनाकार ही नहीं थे,सहज सरल मनुष्य भी थे। इसलिए साहित्य और समाज की भी महत्वपूर्ण क्षति है उनका चला जाना।
उन्हें शत-शत नमन

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